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किशोरावस्था में आत्महत्या की बढ़ोतरी क्यों हैं?

प्रश्नकर्ता: दादाजी, एक बहन पूछती है कि हमें लड़कों के साथ ‘फ्रेन्डली रिलेशन’ (मैत्री संबंध) हों, फिर भी माता-पिता शंका क्यों करते हैं?

दादाश्री: नहीं, लड़कों के साथ फ्रेन्डली रिलेशन रख ही नहीं सकते। लड़कों के साथ फ्रेन्डली रिलेशन गुनाह है।

प्रश्नकर्ता: उसमें क्या गुनाह है?

दादाश्री: पेट्रोल और आग, दोनों साथ नहीं रख सकते न? वे दोनों (लड़का और लड़की) मौका ढूँढते रहते हैं। यह सोचे कि कब मेरी पकड़ में आये और सामनेवाला सोचे कि यह कब मेरी पकड़ में आये?! दोनों शिकार की ताक में रहते हैं, दोनों ही शिकारी कहलाए!

प्रश्नकर्ता: आपने कहा न कि लड़के और लड़कियों की दोस्ती नहीं करनी चाहिए।

दादाश्री: बिलकुल नहीं करनी चाहिए।

प्रश्नकर्ता: बिलकुल नहीं करनी चाहिए, ऐसा कहा इससे उन लोगों को संतोष नहीं हुआ।

दादाश्री: वह फ्रेन्डशिप आखिर में पोईज़न (ज़हर) समान होगी, आखिर पोईज़न ही होगी। लड़की को मरने का समय आयेगा, लड़के का कुछ नहीं जाता। इसलिए लड़के के साथ तो खड़ा भी नहीं रहना चाहिए। लड़कों से कोई फ्रेन्डशिप करना नहीं। वर्ना वह तो पोईज़न है। लाख रुपये दे फिर भी फ्रेन्डशिप मत करना। फिर अंत में ज़हर खाकर मरना पड़ता है। कितनी ही लड़कियाँ ज़हर खाकर मर जाती हैं।       

इसलिए उम्र होने पर हमें घर में माता-पिता से कह देना है कि, किसी अच्छे आदमी के साथ मेरा संबंध कर डालो, फिर से टूटे नहीं ऐसा जोड़ दो। मेरी शादी के लिए अब लड़का ढूँढो। दादा भगवान ने मुझसे कहा है कि ‘तुम कहना।’ ऐसे कह देना, शर्म में मत रहना। तब उन्हें पता चलेगा कि बच्चों की खुशी है, चलो अब शादी करवा दें। बाद में दो साल बाद शादी कर लेना, आमने सामने पसंद करके रिश्ता जोड़ देना। शादी हो जाने पर दूसरा कोई हमारी ओर देखेगा नहीं। कहेगा, उसका तो तय हो गया!

यह दोस्ती अच्छी नहीं, लोग तो छल-कपटवाले होते हैं। सहेलियों के साथ मित्राचारी कर सकते हैं। पुरुषों की मित्राचारी नहीं करनी चाहिए। धोखा देकर निकल जाते हैं। कोई विश्वासपात्र नहीं होता, सभी द़गाबाज। एक भी असली नहीं होता। बाहर किसी का विश्वास मत करना।

शादी कर लेना अच्छा, इधर-उधर भटकें उसमें सार नहीं निकलता। तेरे माता-पिता शादी-शुदा हैं तो है कुछ झंझट? ऐसे तुझे भी शादी के नाते से बँध जाना पसंद नहीं आया? खूँटे से बँधना (शादी के रिश्ते से जुड़ जाना) तुझे पसंद नहीं? मुक्त रहना पसंद है?

Reference: Book Excerpt: माता-पिता और बच्चों का व्यव्हार (Page #81 - Paragraph #11 to #14, Entire Page #82, Page #83 - Paragraph #1)

नहीं होने चाहिए क्लेश, परिणाम में

मतलब, क्रोध-मान-माया-लोभ के उपाय ये हैं। परिणाम को कुछ मत करो, उसके कॉज़ेज को उड़ा दो तो ये सारे चले जाएँगे। इसलिए खुद विचारक होना चाहिए। वर्ना, अजागृत होगा तो किस तरह उपाय करेगा?

पूरा जगत् परिणाम में ही क्लेश कर रहा है। बेटा अनुत्तीर्ण हुआ उसके लिए क्लेश नहीं करना चाहिए। जब वह पढ़ रहा हो तब हमें कहना चाहिए कि, ‘तू पढ़, पढ़!’ उसे टोको, डाँटो, लेकिन अनुत्तीर्ण होने के बाद तो उससे कहना है कि, ‘बैठो खाना खा लो! नदी में डूबने मत जाना!’

Reference: दादावाणी September 2012 (Page 15 - Paragraph #1 & #2)

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