Related Questions

क्या भावनाएँ (उद्वेग) आत्महत्या करने का एक बड़ा कारण बन गया है?

उद्वेग, कितनी मुश्किल

प्रश्नकर्ता: मतभेद के कारण भी तो उद्वेग होता है न?

दादाश्री: हाँ। मतभेद से भी उद्वेग होता है। जब सबकुछ 'एक्सेस' हो जायेे तब उद्वेग शुरू हो जाता है। हद से बाहर हो जाए तब। ये लोग छुरी से मारते हैं न, चाकू से मारते हैं न, ये उद्वेग होता है तभी वे मारते हैं।

प्रश्नकर्ता: उद्वेग यानी अजंपा (बेचैनी, अशांति) कह सकते हैं?

दादाश्री: अजंपा तो बहुत अच्छा होता है। अजंपा तो, जब प्याला गिर जाए तब ही अजंपा होता है। अजंपा तो सरल होता है। उद्वेग तो सिर में झटके लग रहे हो ऐसा लगता है। और ये अजंपा तो प्याला गिर जाए तब अजंपा और कुढऩ (क्लेश) होता रहता है। ये तो जब बहुत बड़ा जोखिम हो गया हो तब उद्वेग होता है। ‘इमोशनल’ हुआ कि उद्वेग शुरू हो जाता है। उद्वेग तो उसे सोने भी नहीं देता न!

प्रश्नकर्ता: लेकिन ‘इमोशनल’ लोगों को चिंता अधिक होती है न?

दादाश्री: चिंता नहीं, उद्वेग बहुत होता है। और वह उद्वेग तो मर जाने जैसा लगता है। ‘मोशन’ अर्थात् वेग में और ‘इमोशनल’ अर्थात् उद्वेग।

प्रश्नकर्ता: अब वेग भी गति में है न?

दादाश्री: वेग तो निरंतर होना ही चाहिए। वेग, ‘मोशन’ तो होना ही चाहिए। जीव में वेग तो अवश्यहोता ही है। और तभी वह ‘मोशन’ में रहता है। किसी भी जीव को वेग अवश्य होता है। जो त्रस्त जीव है, अत: ऐसे त्रस्त होते हैं, ये हाथ लगाए तो भाग जाते हैं, जिसे भय लगता है, उन सभी में वेग अवश्य होता है। लेकिन जो एकेन्द्रिय जीव है, ये पेड़-पौधे हैं, उनमें वेग नहीं होता है। उनका वेग अलग प्रकार का होता है। लेकिन यह वेग तो और सभी जीवों में होता ही है। वे वेग में तो होते ही हैं, निरंतर ‘मोशन’ में, और उस सारे वेग को आगे-पीछे किया तो ‘इमोशनल’ हो जाता है, वह उद्वेग कहलाता है। यह गाड़ी ‘इमोशनल’ हो जाए तो क्या होता है?

प्रश्नकर्ता: नुकसान हो जाता है। ‘एक्सिडेन्ट’ होता है और लोग मर जाते हैं।

दादाश्री: उसी प्रकार से इस देह में भी अंदर बहुत जीव मर जाते हैं। उनकी जोखिमदारी आती है और फिर खुद के उद्वेग से जो दु:ख होता है, वह दूसरी जोखिमदारी है।

उद्वेग कैसा होता है? कि पटरी पर सुला देता है, नदी में छलाँग लगवा देता है, नहीं तो कुछ पी लेता है। उद्वेग अर्थात् वेग ऊँचा चढ़ा, अंदर दिमाग में चढ़ जाता है और फिर गिरा देता है। नहीं तो, खटमल मारने की दवाई खाली कर देता है। ‘अरे, शीशी खाली कर दी?’ तब वह कहता है, ‘हाँ, मैं पी गया।’

उद्वेगवाला मनुष्य बचता नहीं है। अरे, उद्वेग हो जाए तब तो दर्शन करने यहाँ पर भी नहीं आने देगा। उद्वेग तो बहुत खराब चीज़ है। सभी ने उद्वेग नहीं देखा होता है। यह ‘ज्ञान’ है इसलिए निर्जरा के रूप में सबकुछ चला जाएगा। इसलिए उद्वेग से कहें कि ‘जितने आने हो उतने आओ। अभी तो शरीर अच्छा है तब तक आ जाओ। फिर बुढ़ापे में मत आना।’ अभी तो शक्ति है इसलिए अभी आना हो तो आ जाओ, अभी तो धक्का मारकर भी उसे निकाला जा सकता है।

×
Share on
Copy