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पॉज़िटिव एवं नेगेटिव शब्दों का सामनेवालों पर तथा खुद पर क्या असर होता है? सामनेवाले की समझ की जाँच कर सकते हैं?

सामने बड़ी उम्रवाला हो न, तो भी उसे कहेंगे, ‘आपमें अक्कल नहीं है।’ इनकी अक्कल नापने निकले! ऐसा बोला जाता होगा? फिर झगड़े ही होंगे न! पर ऐसा नहीं बोलना चाहिए, सामनेवाले को दु:ख हो वैसा कि ‘आपमें अक्कल नहीं है।’ सामान्य मनुष्य तो नासमझी के मारे ऐसा बोलकर जिम्मेदारी स्वीकारता है। पर समझदार हों, वे तो खुद ऐसी जिम्मेदारी लेते ही नहीं न! नासमझीवाला उल्टा बोले पर खुद को सीधा बोलना चाहिए। सामनेवाला तो नासमझी से चाहे जो पूछे, पर खुद को उल्टा नहीं बोलना चाहिए। जिम्मेदार है खुद।

‘आप समझते नहीं हो’ हमें ऐसा भी नहीं बोलना चाहिए। हमें तो ऐसा कहना चाहिए कि... भाई, सोचो तो सही, आप ज़रा सोचो तो सही। ‘समझते ही नहीं हो’ कहें, तो क्या सब मूर्ख ही हैं। लोग ऐसा बोलते हैं या नहीं बोलते?

प्रश्नकर्ता: ये बुद्धिशाली ऐसा ही कहते हैं कि ‘इसे’ समझ नहीं है’।

दादाश्री: हाँ, सामनेवाले से ऐसा कहते हैं। ‘आप नहीं समझेंगे’ ऐसा कहना, सब से बड़ा ज्ञानावरण कर्म है। ‘आप नहीं समझेंगे’, ऐसा नहीं कहना चाहिए, लेकिन ‘आपको समझाऊँगा’ ऐसा कहना चाहिए। ‘आप नहीं समझेंगे’ कहने से सामनेवाले के दिल पर चोट लगती है।

Reference: Book Name: वाणीके सिद्धांत (ग्रंथ) (Page #385 - Paragraph #1 to #4)

पॉजिटिव दृष्टि से प्रोत्साहन

इस जगत् में हमेशा ‘पॉजिटिव’ लीजिए। ‘नेगेटिव’ की ओर कदम मत बढ़ाना। ‘पॉजिटिव’ का उपाय होगा। मैं आपको सयाना कहूँ और आपका अहंकार यदि ज्यादा अकड़ दिखाए तो आपको धौल जमाना भी मुझे आता है, वर्ना वह उलटी राह चल पड़े और यदि ‘एन्करेज’ (प्रोत्साहित) नहीं करें तो आगे प्रगति रुक भी जाती है।

मूरख कहने पर भी बिगड़ जाए और बहुत सयाना कहने पर भी बिगड़ जाए। क्योंकि सयाना कहने पर उसके अहंकार को ‘एन्करेजमेंट’ (प्रोत्साहन) मिलता है और मूरख कहने पर ‘साइकोलॉजिकल इफेक्ट’ (मानसिक असर) उलटा पड़ता है। सयाने मनुष्य को पच्चीस-पचास बार मूरख कहने पर उसके मन में वहम हो जाएगा कि ‘क्या मैं सचमुच पगला हूँ?’ ऐसा करते-करते वह पागल हो जाएगा। इसलिए मैं पागल को भी ‘तेरे जैसा सयाना इस जगत् में कोई नहीं है’ ऐसा कहकर उसे प्रोत्साहित किया करता हूँ।

दुनिया में किसी को बिना अक़्ल का मत कहना। अक़्लमंद ही कहना, तू सयाना है ऐसा ही कहना, तो आपका काम होगा। एक मनुष्य अपनी भैंस से कहता था कि ‘तू बहुत सयानी है मैया, बहुत अक़्लमंद है, बहुत समझदार है।’ मैंने उनसे पूछा, ‘तू भैंस को ऐसा क्यों कहता है?’ तब वह कहे कि ‘ऐसा नहीं कहूँ तो भैंस दूध देना बंद कर देगी।’ अब यदि भैंस ऐसा समझती है तो मनुष्य क्या नहीं समझेंगे?

Reference: दादावाणी - Sep 2009 (Page #21 - Paragraph #4 to #7)

नेगेटिव शब्दों का कैसा असर?

एक मनुष्य को सोचने पर ऐसा वहम हो गया कि सालभर से दुकान में प्रतिदिन नुकसान ही आता रहता है और फिर मुनीम ने चोरी करना शुरू किया है, इसलिए अब यह दुकान नहीं रहेगी। अक़्लमंद को जल्दी पता चल जाता है और अक़्ल कम रही हो तो देर से पता चलेगा। अक़्लमंद जल्दी से हिसाब लगा लेगा कि यह दुकान नादारी में जा रही है। क्योंकि मन में ऐसा तय हो गया कि नादारी हो रही है, ऐसा डिसीझन आ गया, इसलिए वह शब्द उसे असर करता रहेगा। जब तक वह शब्द दिमाग़ से नहीं निकलेगा तब तक वह असर करता रहेगा। इसलिए मैं कहता हूँ कि आपको जो भी विचार आए उसे आप मेरे पास भेज दीजिए, ‘गो टु दादा।’ वर्ना सब असर करता रहेगा। शब्द तो बहुत असरदार होते है। असरवाली चीज़ें हैं ये, उसमें मत पड़ना। मुझे बुख़ार आया हो तो मैं कभी ऐसा नहीं कहता कि, ‘मुझे बुख़ार आया है।’ ऐसा कहूँ तो असर हो जाए।

लोग ऐसा बोलते हैं न कि, ‘मेरा दिमाग़ चलता ही नहीं है।’ अरे! ऐसा नहीं बोलते। ‘मेरा दिमाग़ चलता ही नहीं है’ ऐसा कहने से तो दिमाग़ पर बोझ बना रहेगा और फिर बंद हो जाएगा धीरे-धीरे। आप बोले, मतलब आपने हस्ताक्षर कर दिए। इसलिए आप उसे ‘दादा’ के पास भेज देना, कोई हर्ज नहीं है उसमें।

प्रश्नकर्ता: यह आपने उत्तम रास्ता दिखलाया।

दादाश्री: हाँ, मैं सभी से यही कहता हूँ कि सब मेरे पास भेज दीजिए न। तुझ पर बोझ तो आनेवाला है ही, मनुष्य जो ठहरा, इसलिए बोझ तो आएगा।

Reference: दादावाणी - Sep 2009 (Page 14 - Paragraph #8 & #9, Page #15 - Paragraph #1 & #2)

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