Related Questions

चिंता को अहंकार का लक्षण क्यों कहा है?

प्रश्नकर्ता : चिंता ही अहंकार की निशानी है, इसे ज़रा समझाइए।

दादाश्री : चिंता अहंकार की निशानी क्यों कहलाती है? क्योंकि उसके मन में ऐसा लगता है कि 'मैं ही इसे चला रहा हूँ'। इससे उसे चिंता होती है। 'इसका चलानेवाला मैं ही हूँ', इसलिए उसे 'इस लड़की का क्या होगा? इन बच्चों का क्या होगा? यह कार्य पूरा नहीं हुआ तो क्या होगा?' वह चिंता अपने सिर लेता है। खुद अपने आपको कर्ता मानता है कि 'मैं ही मालिक हूँ और मैं ही करता हूँ।' लेकिन वह खुद कर्ता है नहीं और व्यर्थ चिंताएँ मोल लेता है।

संसार में हो और चिंता में ही रहे और चिंता नहीं मिटे तो फिर उसे कितने ही जन्म लेने होंगे! क्योंकि चिंता से ही जन्म बँधते हैं।

यह छोटी सी बात आपको बता देता हूँ, यह बारीक बात आपको बता देता हूँ कि इस संसार में कोई मनुष्य ऐसा पैदा नहीं हुआ कि जिसे संडास जाने की स्वतंत्र शक्ति हो। तब फिर इन लोगों को इगोइज़म करने का क्या अर्थ हैं? यह दूसरी शक्ति काम कर रही है। अब, वह शक्ति अपनी नहीं है, वह पर-शक्ति है और स्व-शक्ति को जानता नहीं है, इसलिए खुद भी पर-शक्ति के आधीन है, और सिर्फ आधीन ही नहीं लेकिन पराधीन भी है। पूरा जन्म ही पराधीन है। 

×
Share on
Copy