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चिंता क्यों नहीं करनी चाहिए?

चिंता से तो काम बिगड़ता है। जो चिंता है वह काम को सौ प्रतिशत के बजाय सत्तर प्रतिशत कर देती है। चिंता काम को ऑब्स्ट्रक्ट (विघ्न डालना) करती है। यदि चिंता नहीं हो, तो बहुत सुंदर परिणाम आएगा।

जैसे कि 'हम मरनेवाले हैं', ऐसा जानते सभी हैं। लेकिन जब मृत्यु याद आती है तब क्या करते हैं लोग? याद आए, तब क्या करते हैं? उसे धक्का मार देते हैं। हमें कुछ हो जाएगा तो, ऐसा याद आते ही धक्का मार देते हैं। उसी प्रकार जब अंदर चिंता होने लगे, तब धक्का मार देना कि यहाँ नहीं भाई!

चिंता से हमेशा सब बिगड़ता है। चिंता मे यदि मोटर चलाओगे तो टकरा जाएगी। चिंता से व्यापार करे, वहाँ काम उलट देता है। चिंता से यह सब बिगड़ा है संसार में।

चिंता करने जैसा संसार है ही नहीं। इस संसार में चिंता करना, वह बेस्ट फूलिशनेस है। संसार चिंता करने के लिए है ही नहीं। यह इट सेल्फ क्रिएशन है। भगवान ने यह क्रिएशन नहीं किया है। इसलिए चिंता करने के लिए यह क्रिएशन नहीं है। ये मनुष्य सिर्फ चिंता ही करते हैं, अन्य कोई जीव चिंता नहीं करते। अन्य चौर्यासी लाख योनियाँ हैं, लेकिन कोई चिंता-वरीज़ नहीं करता। ये मनुष्य नामक जीव ज़रूरत से ज़्यादा अ़क्लवाले हैं, वे ही सारा दिन चिंता में जलते रहते हैं।

चिंता तो प्योर इगोइज़म हैं। ये जानवर कोई चिंता नहीं करते और इन मनुष्यों को चिंता? ओ हो हो! अनंत जानवर हैं, किसीको चिंता नहीं है और ये मनुष्य अकेले ही जड़ जैसे है कि सारा दिन चिंता में जलते रहते हैं।

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