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चिंता क्या है?

चिंता यानी क्या, यह समझ लेना चाहिए कि यह मन का विचार ऐसे उठ रहा है। हमें किसी भी बारे में, धंधे संबंधी, अन्य किसी भी संबंध में, या कोई बीमारी हो और, उसके लिए विचार आया, कुछ हद तक पहुँचने के बाद वह विचार हमें चक्कर में डाल दे और चक्कर में डाले तो समझना कि यह उलटे रास्ते चला है, यानी बिगड़ गया। वहाँ से फिर चिंता शुरू हो जाती है।

सोचने करने में हर्ज नहीं है। लेकिन सोच यानी क्या? एक विचार शुरू हुआ और एक हद से आगे गया, तो वह चिंता कहलाती है। हद के अंदर ही सोचना चाहिए। विचारों की नोर्मेलिटी कितनी? अंदर बवंडर नहीं उठे, तब तक। बवंडर उठने लगे तब बंद कर देना। बवंडर उठने के बाद चिंता शुरू हो जाती है। यह हमारी खोज है।

चिंता करने का अधिकार नहीं है। सोचने का अधिकार है, कि भाई यहाँ तक सोचना, और सोच जब चिंता में परिणामित हो तो बंद कर देना चाहिए। ये अबव नोर्मल विचार, चिंता कहलाते हैं। इसलिए हम सोचते करते हैं, परंतु यदि अबव नोर्मल हुआ और उलझे पेट में, तब बंद कर देते हैं।

प्रश्नकर्ता : आम तौर परभीतर देखते रहे, तब तक विचार कहलाता हैं और भीतर चिंता होने लगी तो लपेट में आ गया, ऐसा कहलाता॒है।

दादाश्री : चिंता हुई यानी लपेट में ही आ गया न। चिंता हुई अर्थात् वह समझता है कि मेरे कारण ही चलता है, ऐसा मान बैठता है। इसलिए उन सब पचड़ों में पड़ने जैसा ही नहीं है औरहै भी ऐसा ही। यह तो सभी मनुष्यों में यह रोग घुस गया है। अब निकले कैसे जल्दी? जल्दी निकलेगा नहीं न! आदत हो गई है, वह जाएगी नहीं न! हेबीच्युएटेड।

प्रश्नकर्ता : आपके पास आए तो निकल जाता है न?

दादाश्री : हाँ, निकल जाता है, लेकिन धीरे धीरे निकलता है, लेकिन एकदम से नहीं जाती न फिर!

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