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वर्तमान में रहें। चिंता क्यों?

अहमदाबाद के कुछ सेठ मिले थे। वे भोजन के समय मिल में चले जाते हैं। मेरे साथ भोजन लेने बैठे थे। तब सेठानी सामने आकर बैठीं। मैंने पूछा, 'सेठानीजी, आप क्यों सामने आकर बैठ गईं?' तो बोलीं, 'सेठजी ठीक से भोजन नहीं करते हैं, कभी भी।' इससे मैं समझ गया। जब मैंने सेठजी से पूछा तो बोले, 'मेरा चित्त पूरा वहाँ चला जाता है।' मैंने कहा, 'ऐसा मत करना। वर्तमान में थाली आई, उसे पहले, अर्थात् प्राप्त को भोगो, अप्राप्त की चिंता मत करो। जो प्राप्त वर्तमान है उसे भोगो।

चिंता होती हो तो फिर भोजन लेने रसोईघर में जाना पड़ता है? फिर बेडरूम में सोने जाना पड़ता है? और ऑफिस में काम पर?

प्रश्नकर्ता : वो भी जाते हैं।

दादाश्री : वे सारे डिपार्टमेन्ट हैं। तो इस एक ही डिपार्टमेन्ट की परेशानी दूसरे डिपार्टमेन्ट में मत ले जाना। एक डिविज़न में जाओ तब वहाँ का, उतना ही संपूर्ण काम कर लेना। लेकिन दूसरे डिविज़न में भोजन करने गए, तो पहले डिविज़न कीपरेशानी वहीं छोड़कर, वहाँ भोजन करने बैठे तो टेस्ट से खाना। बेडरूम में जाने पर भी पहलेवाली परेशानी वहीं की वहीं रखना। जिसकी ऐसी सेंटिग नहीं है, वह मनुष्य मारा जाएगा। खाना खाने बैठा हो, तब चिंता करे कि ऑफिस में साहब डाँटेंगे तब क्या करूँगा? अरे, डांटेगे तब देख लेंगे! अभी आराम से खा न!

भगवान ने क्या कहा था कि, 'प्राप्त को भोगो, अप्राप्त की चिंता मत करो।' अर्थात् क्या कि, 'जो प्राप्त है उसे भोगो!'

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