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चिंता को कैसे रोकें?

जी जलता रहे, ऐसी चिंता तो काम की ही नहीं। जो शरीर को नु़कसान करती है और हमारे पास जो वस्तु आनेवाली थी, उसमें विघ्न डालती है। चिंता से ही ऐसे संयोग पैदा हो जाते हैं। सार-असार के अथवा ऐसे विचार करने चाहिए, मगर चिंता किसलिए? इसे इगोइज़म (अहंकार) कहा है। वैसा इगोइज़म नहीं होना चाहिए। 'मैं कुछ हूँ और मैं ही चला रहा हूँ', इससे उसे चिंता होती है और 'मैं होऊँगा तभी इस केस का समाधान होगा', उसीसे चिंता होती रहती हैं। इसलिए इगोइज़म वाले भाग का ऑपरेशन कर देना, फिर जो सारासार के विचार रहें, उसमें हर्ज नहीं है। वह फिर भीतर खून नहीं जलाते। वर्ना चिंता तो खून जलाती है, मन जलाती है। चिंता होती हो, उस समय बच्चा कुछ कहने आए, तो उस पर भी उग्र हो जाता है अर्थात् हर तरह से नु़कसान करती है। यह अहंकार ऐसी चीज़ है कि पैसे हों या नहीं हों, लेकिन कोई कहेगा कि, 'इस चंदूभाई ने मेरा सब बिगाड़ दिया', तब अपार चिंता और अपार उपाधि हो जाती है। और संसार तो, हमने नहीं बिगाड़ा हो फिर भी कहता है न!

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