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चिंताओं से मुक्त कैसे रहे? आत्मज्ञान पाएँ!

प्रश्नकर्ता : चिंताक्यों नहीं छूटती? चिंता से मुक्त होने के लिए क्या करें?

दादाश्री : चिंताबंद हुई हो, ऐसामनुष्य मिलेगा ही नहीं। कृष्ण भगवान के भक्त को भी चिंता बंद नहीं हुई होती है न! और चिंता से सारा ज्ञान अंधा हो जाता है, फ्रेक्चर हो जाता है।

संसार में एक मनुष्य ऐसा नहीं होगा कि जिसे चिंता नहीं होती हो। साधु-साध्वी सभी को कभी न कभी तो चिंता होती ही है। साधु को इन्कमटेक्स नहीं होता, सेल्स टेक्स नहीं होता, न भाड़ा होता है, फिर भी कभी न कभी चिंता होती है। शिष्य के साथ झंझट हो तो भी चिंता हो जाती है। आत्मज्ञान के बगैर चिंता जाती नहीं।

एक घंटे में तो तेरी सारी चिंताएँ मैं ले लेता हूँ और गारन्टी देता हूँ कि यदि एक भी चिंता हो तो वकील करके अदालत में मुझ पर केस चलाना। ऐसे हमने हजारों लोगों को चिंता रहित कर दिया है। अरे माँग! माँगे वह दूँ ऐसा है, लेकिन ज़रा ठीक से माँग, ऐसा माँगना कि जो तेरे पास से कभी जाए नहीं। ये नाशवंत चीज़ें मत माँगना। शाश्वत सुख माँग लेना।

हमारी आज्ञा में रहे और एक चिंता हो तो फिर दावा दायर करने की छूट दी है। हमारी आज्ञा में रहना। यहाँ पर सब कुछ मिले, ऐसा है। इन सभी से शर्त क्या रखी है, जानते हो तुम? एक चिंता हो तो मुझ पर दो लाख का दावा दायर करना।

प्रश्नकर्ता : आपकेपास से ज्ञान पाया, मन-वचन-काया आपको अर्पण किए, फिर चिंता होती ही नहीं।

दादाश्री : होगी ही नहीं।

चिंता गई, उसका नाम समाधि। उससे फिर पहले से काम भी ज़्यादा होगा, क्योंकि उलझन नहीं रही न फिर! ऑफिस जाकर बैठे कि काम होता रहता है। घर के विचार नहीं आते, बाहर के विचार नहीं आते, और किसी प्रकार के विचार ही नहीं आते और संपूर्ण एकाग्रता रहे।

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