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बच्चों को पढ़ाई-लिखाई के संबंधित मार्गदर्शन कैसे दें?

एक भाई मुझसे कहता है, मेरा भतीजा हर रोज़ नौ बजे उठता है। घर में कोई काम नहीं करता। फिर घर के सभी सदस्यों से पूछा कि यह जल्दी नहीं उठता यह बात आप सबको पसंद नहीं क्या? तब सभी ने कहा, ‘हमें पसंद नहीं, फिर भी वह जल्दी उठता ही नहीं।’ मैंने पूछा, ‘सूर्यनारायण आने के बाद उठता है या नहीं उठता?’ तब कहा, ‘उसके बाद भी एक घंटे के पश्चात् उठता है।’ इस पर मैंने कहा कि ‘सूर्यनारायण की भी मर्यादा नहीं रखता, तब तो वह बहुत बड़ा आदमी होगा! नहीं तो लोग सूर्यनारायण के आने से पहले सब जाग जाते हैं, लेकिन यह तो सूर्यनारायण की भी परवाह नहीं करता।’ फिर उन लोगों ने कहा, आप उसे थोड़ा डाँटो। मैंने कहा, ‘हम डाँट नहीं सकते। हम डाँटने नहीं आए, हम समझाने आए हैं। हमारा डाँटने का व्यापार ही नहीं हैं, हमारा तो समझाने का व्यापार है।’ फिर उस लड़के से कहा, ‘दर्शन कर ले और रोज़ बोलना कि दादा मुझे जल्दी उठने की शक्ति दो।’ इतना उससे कराने के बाद घर के सभी लोगों से कहा, अब वह चाय के समय भी नहीं उठे तो उससे पूछना कि, ‘भई, ये ओढ़ा दूँ तुझे? जाड़े की ठंड है, ओढ़ना हो तो ओढ़ा दूँ।’ इस प्रकार मज़ाक में नहीं, लेकिन सही में उसे ओढ़ा देना। घर के लोगों ने ऐसा किया। परिणाम स्वरूप सिर्फ छ: महीनों में वह लड़का इतना जल्दी उठने लगा कि घर के सभी लोगों की शिकायत चली गई।

प्रश्नकर्ता: आज के बच्चे पढ़ने के बजाय खेलने में ज़्यादा रुचि रखते हैं, उन्हें पढ़ाई की ओर ले जाने के लिए उनसे कैसे काम लिया जाए, जिससे लड़कों के प्रति क्लेश उत्पन्न न हो?

दादाश्री: इनामी योजना निकालो न! लड़कों से कहो कि पहला नंबर आएगा उसे इतना इनाम दूँगा और छठा नंबर आएगा, उसे इतना इनाम और पास होगा उसे इतना इनाम। कुछ उनका उत्साह बढ़े ऐसा करो। उसे तुरंत फायदा हो ऐसा कुछ दिखाओ, तब वह चुनौती स्वीकारेगा। दूसरा क्या रास्ता करने का? वर्ना उन पर प्रेम रखो। प्रेम हो तो बच्चे सबकुछ मानते हैं। मेरा कहा सब बच्चे मानते हैं। मैं जो कहूँ वह करने के लिए तैयार हैं, यानी हमें उन्हें समझाते रहना चाहिए। फिर जो करे वह सही।

प्रश्नकर्ता: मूल समस्या यह है कि पढ़ने के लिए बच्चों को हम कईं तरह से समझाते हैं लेकिन हमारे कहने पर भी वे लोग समझते नहीं, हमारी सुनते नहीं।

दादाश्री: ऐसा नहीं कि वे नहीं सुनते, लेकिन आपको माँ होना नहीं आया इसलिए। अगर माँ होना आता तो क्यों नहीं सुनते? क्यों बेटा नहीं मानता? क्योंकि ‘अपने माता-पिता का कहा खुद उसने कभी माना ही नहीं था॒न!’

प्रश्नकर्ता: दादा, उसमें वातावरण का दोष है या नहीं?

दादाश्री: नहीं, वातावरण का दोष नहीं है। माता-पिता को वास्तव में माता-पिता होना आया ही नहीं। प्रधानमंत्री बनने में उसमें कम ज़िम्मेदारी है, लेकिन माता-पिता होना, उसमें बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है।

प्रश्नकर्ता: वह कैसे?

दादाश्री: प्रधानमंत्री होने में तो लोगों का ऑपरेशन है। यहाँ तो बच्चों का ही ऑपरेशन होना है। घर में दाखिल हों तो बच्चे खुश हो जाएँ ऐसा होना चाहिए और आजकल तो बच्चे क्या कहते हैं? ‘हमारे पिताजी घर में न आएँ तो अच्छा।’ अरे, ऐसा हो तब फिर क्या हो?

इसलिए हम लोगों से कहते हैं, ‘भैया, बच्चों को सोलह साल के होने बाद ‘फ्रेन्ड (मित्र) के रूप में स्वीकार लेना’, ऐसा नहीं कहा? ‘फ्रेन्डली टोन’ (मैत्रीपूर्ण व्यवहार) में हो न, तो अपनी वाणी अच्छी निकले, वर्ना हर रोज़ बाप बनने जाएँ तो कोई सार नहीं निकलता। बेटा चालीस साल का हुआ हो और हम बापपना दिखाएँ तो क्या हो?

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