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विवाहित जीवन में होनेवाली परेशानियों के पीछे क्या कारण हैं?

प्रश्नकर्ता: मतभेद क्यों होते हैं? इसकी वजह क्या?

दादाश्री: मतभेद होता है, तब वह समझती है कि मैं अ़क्लमंद और यह समझता है मैं अ़क्लमंद। अ़क्ल के ठेकेदार आए! बेचने जाएँ तो चार आने भी नहीं आएँ! इसके बजाय हम सयाने हो जाएँ, उसकी अ़क्ल को हम देखा करें कि अहोहो... कैसी अ़क्लमंद है! तब वह भी ठंडी पड़ जाएगी। लेकिन हम भी अ़क्लमंद और वह भी अ़क्लवाली, अ़क्ल ही जहाँ लड़ने लगे, वहाँ क्या होगा फिर?!
तुम्हें मतभेद ज़्यादा होते हैं कि उन्हें ज़्यादा होते हैं?

प्रश्नकर्ता: उन्हें ज़्यादा होते हैं।

दादाश्री: अहोहो! मतभेद यानी क्या? मतभेद का अर्र्थ तुम्हें समझाता हूँ। यह रस्सा-कशी का खेल होता है न, देखा है तुमने?

प्रश्नकर्ता: हाँ।

दादाश्री: दो-चार लोग इस ओर खींचते हैं और दो-चार आदमी उस ओर खींचते हैं। मतभेद अर्थात् रस्साकशी। अत: हमें देखना है कि घर में बीवी बहुत ज़ोर से खींच रही है और हम भी ज़ोर से खींचेंगे तब फिर क्या होगा?

प्रश्नकर्ता: टूट जाएगा।

दादाश्री: और टूट जाने पर गाँठ लगानी पड़ती है। तब गाँठ लगाकर चलाना, इससे तो अगर साबुत रखें, उसमें क्या हर्ज है? इसलिए जब वह बहुत खींचे न, तब हमें छोड़ देना चाहिए।

प्रश्नकर्ता: दो में से छोड़े कौन?

दादाश्री: समझदार, जिसमें अ़क्ल ज़्यादा है वह छोड़ देगा और कमअ़क्ल खींचे बगैर रहेगा ही नहीं! इसलिए हमें, अ़क्लमंद को छोड़ देना है और वह भी एकदम नहीं छोड़ना। एकदम छोड़ दें न, तो सामनेवाला गिर पड़ेगा। इसलिए धीरे-धीरे, धीरे-धीरे छोड़ना। मेरे साथ कोई खींचने लगे तब मैं धीरे-धीरे छोड़ देता हूँ। वर्ना गिर पड़े बेचारा। अब तुम छोड़ दोगे ऐसे? अब छोड़ना आएगा? छोड़ दोगे न? वर्ना रस्सा गाँठ मारकर चलाना पड़ेगा। रोज़ रोज़ गाँठ लगाना, यह क्या अच्छा लगता है? और फिर रस्सा तो चलाना ही पड़ता है न! तुम्हें क्या लगता है?

घर में मतभेद होने चाहिए? ज़रा-सा भी नहीं होना चाहिए!! घर में अगर मतभेद होता है तो यू आर अनफिट। अगर हज़बेन्ड ऐसा करे तो वह अनफिट फॉर हज़बेन्ड और वाइफ ऐस करे तो अनफिट फॉर वाइफ।

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