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क्या मुझे मेरे जीवनसाथी को उसकी गलतियाँ बतानी चाहिएँ?

प्रश्नकर्ता: भूल निकालें तब बुरा लगता है उसे और नहीं निकालें तब भी बुरा लगता है।

दादाश्री: नहीं, नहीं, बुरा नहीं लगता है। आप भूल नहीं निकालोगे तो वह कहेगी, ‘कढ़ी खारी थी, फिर भी नहीं कहा!’ तब आप कहना, ‘तुम्हें पता चलेगा न, मैं क्यों कहूँ?’ पर यह तो कढ़ी खारी बनी तो मुँह बिगाड़ता हैं, ‘कढ़ी बहुत खारी है!’ अरे! किस तरह के आदमी हो? इसे पति के रूप में कैसे रखा जाए? ऐसे पति को निकाल बाहर करना चाहिए। ऐसे कमज़ोर पति! क्या पत्नी यह नहीं समझती कि तू उसे समझाने निकला है! उसके साथ माथापच्ची करता है! फिर उसके हृदय पर चोट नहीं लगेगी क्या? मन में कहेगी, ‘क्या मैं यह नहीं समझती? यह तो मुझे बाण लगा रहा है। यह कलमुँहा हर रोज़ मेरी गलतियाँ निकालता रहता है।’ लोग जान-बूझकर ऐसी भूलें निकालते रहते हैं। इसीसे संसार ज़्यादा बिगड़ता जा रहा है। आपको क्या लगता है? यानी हम थोड़ा सोचें तो क्या हर्ज है?

प्रश्नकर्ता: गलतियाँ निकालें तो फिर उनसे फिर से गलती नहीं होगी न?

दादाश्री: अहोहो, अर्थात् सीख देने के लिए! तब भूल निकालने में हर्ज नहीं, मैं आपसे क्या कहता हूँ कि भूलें निकालो, पर वह उसे उपकार समझे तब भूलें निकालो। वह कहे कि ‘अच्छा हुआ आपने मेरी भूल बताई। मुझे तो मालूम ही नहीं।’ आप उपकार मानती हो? बहन, आप इनका उपकार मानती हो?

प्रश्नकर्ता: नहीं।

दादाश्री: तब फिर उसका अर्थ ही क्या निकला? जो भूलें वह जानती हो, उन्हें बताने का अर्थ क्या है? उन्हें स्त्रियाँ कलमुँहा कहती हैं, कि ‘कलमुँहा जब देखो तब बोलता रहता है।’ जिस भूल को वह जानती हो, वह भूल हमें नहीं निकालनी चाहिए। अन्य कुछ भी हुआ हो, कढ़ी खारी बनी हो या फिर सब्ज़ी बिगड़ गई हो, जब वह खाएगी तब उसे पता चलेगा या नहीं? इसलिए हमें कहने की ज़रूरत नहीं है! पर जो भूल उसे मालूम नहीं हो, वह हम बतायें तो वह उपकार मानेगी। बा़की, जो वह जानती हो, वह भूल दिखाना तो गुनाह है। अपने इन्डियन लोग ही निकालते हैं।

मैं तो सांताक्रुज में तीसरी मंज़िल पर घर में बैठा होऊँ तो चाय आती है। तब किसी दिन ज़रा शक्कर डालना भूल गए हों, तो पी जाता हूँ और वह भी दादा के नाम पर। भीतर दादा से कहता हूँ कि ‘चाय में शक्कर डालो साहब!’ तब दादा डाल देते हैं! अर्थात् बगैर शक्कर चाय आए तब पी जाते हैं बस। हमें तो कुछ परेशानी ही नहीं न! और फिर वे शक्कर लेकर आते हैं। मैंने पूछा, ‘भाई, शक्कर क्यों लाया? ये चाय के कप-प्लेट ले जा!’ तब बोला, ‘चाय फीकी थी फिर भी आपने शक्कर नहीं माँगी!’ मैंने कहा, ‘मैं क्यों कहूँ? तुम्हारी समझ में आए ऐसी बात है।’

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