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घर में शांति कैसे रखें?

प्रश्नकर्ता: मुख्य वस्तु यह कि घर में शांति रहनी चाहिए।

दादाश्री: मगर शांति कैसे रहे? लड़की का नाम शांति रखें, फिर भी शांति नही रहती। उसके लिए तो धर्म समझना चाहिए। घर के सभी सदस्यों से कहना चाहिए कि, ‘हम घर के सभी सदस्य आपस में किसी के बैरी नहीं हैं, किसी का किसी से झगड़ा नहीं है। हमें मतभेद करने की कोई ज़रूरत नहीं हैं। आपस में मिल-बाँटकर शांतिपूर्वक खाओ-पीओ। आनंद करो, मौज करो।’ इस प्रकार हमें सोच-समझकर सब करना चाहिए। घरवालों के साथ क्लेश कभी भी नहीं करना चाहिए। उसी घर में पड़े रहना है फिर क्लेश किस काम का? किसीको परेशान करके खुद सुखी हो सके, ऐसा कभी नहीं होता। हमें तो सुख देकर सुख लेना है। हम घर में सुख देंगे, तभी सुख मिलेगा और वह चाय-पानी भी ठीक से बनाकर देगी, वर्ना चाय भी ठीक से नहीं बनाएगी।

यह तो कितनी चिंता-संताप! मतभेद ज़रा भी कम नहीं होता, फिर भी मन में मानते हैं कि मैंने कितना धर्म किया! अरे, घर में मतभेद टला? कम भी हुआ है? चिंता कम हुई? कुछ शांति आई? तब कहता है कि नहीं, लेकिन मैंने धर्म तो किया न? अरे, तू किसे धर्म कहता है? धर्म से तो भीतर शांति हो जाती है। जहाँ आधि-व्याधि-उपाधि नहीं हो, वह धर्म! स्वभाव (आत्मा) की ओर जाना धर्म कहलाता है। यह तो क्लेश परिणाम बढ़ते ही रहते हैं!

वाइफ के हाथ से अगर पंद्रह-बीस इतनी बड़ी काँच की डिशें और ग्लास-वेयर गिरकर फूट जाएँ तो? उस वक्त आप पर कोई असर होता है क्या?

दु:ख होता है, इसलिए कुछ बड़बड़ाये बगैर रहता नहीं न! यह रेडियो बजे बगैर रहता ही नहीं! दु:ख हुआ कि रेडियो शुरू, इसलिए उसे (वाइफ को) दु:ख होता है। तब फिर वह क्या कहेगी? हाँ, जैसे तुम्हारे हाथों तो कभी कुछ टूटता ही नहीं! यह समझने की बात है कि हमसे भी डिशें गिर जाती हैं न। उसे हम कहें कि तू फोड़ डाल तो नहीं फोड़ेगी। फोड़ेगी कभी? वह कौन फोड़ता होगा? इस वर्ल्ड में कोई मनुष्य एक डिश भी फोड़ने की शक्ति नहीं रखता। यह तो सब हिसाब बराबर हो रहा है। डिशें टूटने पर हमें पूछना चाहिए कि तुम्हें लगी तो नहीं है न?

अगर सोफे के लिए झगड़ा हो रहा हो तो सोफे को बाहर फेंक दो। वह सोफा तो दस-बीस हज़ार का होगा, उसके लिए झगड़ा कैसा? जिसने फाड़ा हो उसके प्रति द्वेष होता है। अरे भाई, फेंक आ। जो चीज़ घर में झगड़ा खड़ा करे, उस चीज़ को बाहर फेंक आ।

जितना समझ में आता है, उतनी श्रद्धा बैठती है। उतना ही वह फल देती है, मदद करती है। श्रद्धा नहीं बैठे तो वह मदद नहीं करती। इसलिए समझकर चलोगे तो अपना जीवन सुखी होगा और उनका भी सुखी होगा। अरे! आपकी पत्नी आपको पकौड़े और जलेबियाँ बनाकर नहीं देतीं?

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