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दान कहाँ पर देना चाहिए?

एक आदमी मुझ से सलाह पूछ रहा था कि मुझे देना है तो किस प्रकार दूँ? तब मैंने सोचा, इसे पैसे देने की समझ नहीं है। मैंने कहा, 'तेरे पास पैसे हैं?' उसने कहा, 'हाँ' तब मैंने बताया कि 'इस प्रकार देना।' मैं जानूँ कि यह आदमी दिल का बहुत सा़फ है और भोले दिल का है। उसे सच्ची समझ दो।

बात कुछ ऐसी थी कि हम एक सज्जन के यहाँ गए थे। उसने एक आदमी मुझे छोड़ने के लिए भेजा। केवल छोड़ने के लिए ही। उसने डॉक्टर से कहा कि दादाजी को गाड़ी में छोड़ने आप मत जाना, मैं छोड़ आऊँगा।' इस तरह छोड़ने के लिए आए और उसमें बातचीत हुई। वह आदमी मुझसे सलाह माँग रहे थे कि 'मुझे पैसे देने हैं तो कहाँ पर देने, कैसे देने?' 'बंगला बनवाया है, तब पैसे तो कमाए होंगे?' फिर तब बोले, 'बंगला बनवाया, सिनेमा थियेटर बनवाया। अभी सवा लाख रुपये तो मेरे गाँव में दान में दिए हैं।' तब मैंने कहा कि 'अधिक कमाए हों, तो एकाध आप्तवाणी छपवा देना।' तुरन्त ही उसने कहा, 'आपके कहने की देर है, यह तो मुझे मालूम ही नहीं था। मुझे कोई समझाता ही नहीं है।' फिर कहता है, 'इस महीने में तुरंत ही छपवा दूँगा।' फिर जाकर पूछने लगा कि कितना खर्च होगा? तब कहा कि 'बीस हज़ार होंगे।' तुरंत ही कहता है कि 'इतनी पुस्तकें मुझे छपवा देनी हैं।' मैंने जलदी करने का मना किया उस भाई को।

यानी ऐसे भले आदमी हों न जिन्हें दान देने का समझ में नहीं आता हो, और वह भी पूछे तो उसे बताते हैं। हमें पता है कि यह भोला है। उसे समझ में नहीं आता है तो उसे बताते हैं। बाकी समझदार को तो हमें कहने की ज़रूरत ही नहीं न! नहीं तो उसे दुःख होगा। और दुःख हो ऐसा हमें चाहिए नहीं। यहाँ पैसों की ज़रूरत ही नहीं है। सरप्लस हो तब ही देना, क्योंकि ज्ञानदान जैसा कोई दान ही नहीं है जगत् में!

क्योंकि ये ज्ञान की किताबें कोई पढ़े, तो उसमें कितना सारा परिवर्तन हो जाए। इसलिए हों तो देना, नहीं हों, तो अपने यहाँ कोई ज़रूरत ही नहीं है वहाँ पर!

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