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गुप्तदान किसे कहते हैं?

प्रश्नकर्ता : आत्मार्थी के लिए तो कीर्ति अवस्तु है न?

दादाश्री : कीर्ति तो बहुत नुकसानदायक वस्तु है। आत्मा के रास्ते पर कीर्ति तो उसकी बहुत फैलती है, पर उस कीर्ति में उसे कोई इन्टरेस्ट नहीं होता। कीर्ति तो फैलेगी ही न! चमकीला हीरा हो तो देखकर हर कोई कहे न कि 'कितनी अच्छी लाईट आती है, किरणें कैसी निकलती हैं?' लोग कहते ज़रूर हैं, पर उसे खुद को उसमें मज़ा नहीं आता। जबकि यह संसारी संबंध की कीर्ति है, उस कीर्ति के ही भिखारी हैं। कीर्ति की भीख है उसे इसलिए लाख रुपये हाईस्कूल में देते हैं, अस्पताल में देते हैं, पर कीर्ति उसे मिल जाए तो बहुत हो गया!

फिर वे भी व्यवहार में कहते हैं कि दान गुप्त रखना। अब गुप्त रूप से कोई ही देगा। बाकी सबको कीर्ति की भूख है, इसलिए देते हैं। तब लोग भी बखान करते हैं कि भई! यह सेठ, क्या कहने, लाख रुपये का दान दिया! उतना उसका बदला यहीं का यहीं मिल गया।

अर्थात् देकर उसका बदला यहीं का यहीं ही ले लिया। और जिसने गुप्त रखा, उसने बदला लेने का अगले भव पर छोड़ा। बदला मिले बगैर तो रहता ही नहीं। आप लो या न लो पर बदला तो उसका होता ही है।

अपनी-अपनी इच्छानुसार दान देना होता है। यह तो सब ठीक है, व्यवहार है। कोई दबाव करे कि आपको देने ही पड़ेंगे। फिर फूलहार पहनाएँ, इसलिए देते हैं वे।

दान गुप्त होना चाहिए। जैसे ये मारवाड़ी लोग भगवान के पास चुपचाप डाल आते हैं न! किसी को मालूम नहीं चले तो वह उगेगा!

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