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पैसे और दान के बीच क्या संबंध है?

प्रश्नकर्ता : दान के इन चारों विभागों में क्या पैसों का कोई स्थान नहीं हैं?


दादाश्री : पैसों का दान, ज्ञान-दान में आ जाता हैं। जब पैसों का उपयोग उन किताबों को प्रकाशित करने के लिए होता हैं, जो ज्ञान बाँटती हैं, तो वह ज्ञान दान है।

प्रश्नकर्ता : लेकिन सबकुछ क्या पैसों के द्वारा ही नहीं होता? अन्न दान करने के लिए भी तो पैसों की ज़रूरत होती है।

दादाश्री : हाँ, औषध दान में भी तो पैसों की ज़रूरत हैं। हर प्रकार के दान में पैसों की ज़रूरत हैं। ज्ञान दान के लिए दिया गया पैसों का दान सब से उच्च दान माना जाता हैं।

ज्ञान दान

यहाँ पर किताबों का प्रकाशन होता हैं और हमें यह यकीन हैं कि उसके लिए आर्थिक प्रबंध हो जाएगा। उसके लिए निमित्त होते हैं और वह निमित समय पर हाज़िर हो जाएँगे। इसके लिए हमें लोगों से पैसे माँगने की ज़रूरत नहीं हैं। इसके अलावा, अगर हम लोगों से पैसा माँगें तो उन्हें बुरा लग सकता है और अगर हम उन्हें बताएँ कि हमें कितने पैसों की ज़रूरत हैं, तो वे शायद पीछे हट जाएँ। हमारे मार्ग में यह मुख्य नियम हैं कि हम किसीको भी दुःख नहीं पहुँचाए, और अगर ऐसा हुआ तो हमने हमारी हद्द पार कर दी हैं। हम किसी से कुछ माँग नहीं सकते। अगर कोई स्वेच्छापूर्वक पैसे दे, तभी हम ले सकते हैं। हम किसी व्यक्ति के पैसे तभी ले सकते हैं, अगर वह ज्ञान दान को समझता हो। आज तक जिन्होंने भी पैसे दिए हैं, उन्होंने ज्ञान दान को समझकर दिए हैं। उन्होंने अपनी स्वेच्छा से दिए हैं। हमने कभी किसी से नहीं माँगे।

अगर इन ज्ञान की किताबों के प्रकाशन में पैसों का उपयोग हुआ तो आपके पैसों में चमक आ जाएगी। लेकिन यह तभी संभव हैं, जब आपके पास पुण्य हो। अगर आपका पैसा स्वच्छ है, तभी उनका उपयोग किताबों के प्रकाशन में हो सकता हैं। वर्ना, प्रकाशन के संजोग उत्पन्न नहीं होंगे और किताबें प्रकाशित नहीं होंगी।

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