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दान कैसे करें? परोपकार कैसे करें?

पैसे खर्च हो जाएँगे, ऐसी जागृति रखनी ही नहीं चाहिए। जिस समय जो खर्च हो वह सही। इसलिए पैसे खर्च करने को कहा ताकि लोभ छूटे और बार-बार दे सकें।

उपयोग, वह जागृति है। हम शुभ करें, दान दें, वह दान कैसा? जागृतिपूर्वक का कि लोगों का कल्याण हो। कीर्ति-नाम हमें प्राप्त नहीं हो, इसलिए गुप्त रूप से देते हैं। यह जागृतिपूर्वक कहलाता है न! वह उपयोग कहलाता है। दूसरे तो, नाम नहीं छपा हो तो दूसरी बार देते नहीं।

ऐसा है, शुभमार्ग में भी जागृति कब कहलाती है? इस भव में और परभव में लाभदायी हो, ऐसा शुभ हो, तब वह जागृति कहलाती है। वर्ना, वह दान करता हो, सेवा करता हो, पर आगे की जागृति उसे कुछ भी नहीं होती। जागृतिपूर्वक सभी क्रियाएँ करे तो अगले जन्म का हित होगा, वर्ना नींद में सब जाता है। यह दान किया वह सब नींद में गया! जागते हुए चार आने भी जाएँ तो बहुत हो गया! यह दान दें और भीतर यहाँ की कीर्ति की इच्छा हो, तो वह सब नींद में गया। पर भव के हित के लिए जो दान यहाँ दिया जाए, वह जागृत कहलाता है। हिताहित का भान अर्थात् खुद का हित किस में है और खुद का अहित किस में है और उसके अनुसार जागृति रहे वह! अगले जन्म का कुछ ठिकाना नहीं हो और यहाँ दान करता हो, उसे जागृत कैसे कहा जाए? 

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