क्या आपने कभी यह अनुभव किया है कि किसी भी परिस्थिति को नकारात्मक दृष्टि से देखने से डिप्रेशन शुरू होता है? ऐसी स्थिति में हम समझते हैं कि सबकुछ हमारे ख़िलाफ हो रहा है और यही नकारात्मक दृष्टिकोण की वजह से नकारात्मक विचारों की श्रृखंला शुरू होती है।

निम्नलिखित कथनों पर विचारणा करें:

  • “तुम में बिल्कुल अक्कल नहीं है!”
  • “तुम किसी काम के नहीं हो।”
  • “तुम एक असफल इंसान हो।”
  • “वह तुमसे हर तरह से बेहतर है।”
  • “तुम बिल्कुल ही बेकार हो, कभी नहीं सुधर सकते।”
  • “कोई तुमसे प्यार नहीं करता। हर कोई तुमसे बस नफरत करता है।”
Depression
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अगर आपको बार-बार ऐसी बातें सुनने को मिलें, तो क्या होगा? आपको ये बातें न सिर्फ अपमानजनक लगेगी पर कुछ समय बाद आपको डिप्रेशन आ जाएगा। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि धीरे-धीरे आपको उन लोंगो की नकारात्मक बातों पर विश्वास होने लगता है| उदाहरण के तौर पर, सब से पहले आप खुद से पूछेंगे कि “क्या मैं सचमुच बेकार हूँ?”, “क्या मैं सचमुच एक असफल इंसान हूँ?” और धीरे धीरे आप भी विश्वास करना शुरू कर देते हैं कि “मैं बेकार हूँ|”, “मैं असफल हूँ।” बार-बार अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा मिल रही ऐसी नकारात्मक प्रतिक्रियाओं की वजह से आपकी मनःस्थिति भी बदलने लगती है और आप कुछ समझ पाएं, उससे पहले ही आपके अंदर खुद के प्रति नकारात्मकता शुरू हो जाती है।

तो इस सारी नकारात्मकता का परिणाम क्या आता है? अगर आपकी समझ ही गलत है तो आपकी प्रवृत्तियाँ, आपके विचार और अभिप्राय नकारात्मकता में रूपांतरित हो जाते हैं, जिसके लगातार चलने से आंतरिक अशांति और अंदरूनी बेचैनी शुरू हो जाती है| हालाँकि ये सब किसी भी प्रतिकूल या अस्वीकार्य स्थिति में हमारी अपनी ही प्रतिक्रियाएँ हैं लेकिन लगातार ऐसा होने से हमारी मानसिक अवस्था बिगड़ जाती है, जो हमारे भीतर हिंसक और हानिकारक प्रवृत्तियों या इरादों को जन्म देती है।“मैं बेकार हूँ, मेरे जीने का कोई मतलब नहीं है।”, “मैं अपने जीते जी तो किसीका कुछ भी भला नहीं कर पाया, लेकिन मेरे आत्महत्या करने से शायद दूसरों को अच्छा महसूस हो”, “मैं कभी सुधर नहीं सकता, इसलिए मुझे खुद को सज़ा देनी चाहिए।” और ऐसी बहुत सारी मान्यताएँ और अभिप्राय हमें जकड़कर रखते हैं | खुद के प्रति ऐसी मान्यताएँ और अभिप्राय ही डिप्रेशन का पहला संकेत है|

लेकिन एक मिनट रुकिए! क्या आप यह जानने के बाद भी ऐसा ही सोचेंगे...

  • वह जो इस अपमान और आरोप का सामना कर रहा है वह आप नहीं हैं, लेकिन आपका अहंकार है। आप और आपका अहंकार पूरी तरह से अलग हैं।
  • वह जो निराशा है, वह आप नहीं लेकिन आपका अहंकार है।
  • किसी भी एक क्रिया के लिए विभिन्न संयोगों की आवश्यकता होती है, तो आपके किसी भी कार्य को पूरा करने में आपकी अयोग्यता के लिए सिर्फ आप अकेले दोषित नहीं हैं, क्योंकि उसमें आप तो सिर्फ एक निमित्त ही हैं।
  • नकारात्मक परिस्थिति या निराशा की वजह से जो भी तकलीफ और मानसिक बेचैनी होती है वह सब आपके पिछले जन्मों के कर्मों का ही परिणाम है। आज वे आपके नियंत्रण में नहीं है।

अगर आप और आपका अहंकार अलग हैं, तो आप कौन हैं? आपकी सही पहचान क्या है? आप आसानी से इसका जवाब प्राप्त कर सकते हैं, सिर्फ दो ही घंटों में आत्मज्ञान द्वारा, जिसका प्रारंभ अक्रम विज्ञान के ज्ञानीपुरुष,परम पूज्य दादा भगवान ने किया है। एक सिद्ध वैज्ञानिक प्रक्रिया द्वारा, यह क्रिया परमानेंट ‘मैं’ (सच्चा स्वरुप या शुद्ध आत्मा) को टेम्पररी ‘मेरा’ (अहंकार) से अलग कर देती है। यह दादाश्री द्वारा दिया हुआ एक वैज्ञानिक रास्ता है जिसकी सहायता से हम हमारे भीतर के निराशा जैसे शत्रु को निकाल सकते हैं।

आत्मज्ञान प्राप्ति के बाद, कोई भी परिस्थिति आपको निराश नहीं कर सकती क्योंकि आपके भीतर आपके स्वाभाविक स्वरूप के आनंद की शुरुआत हो जाती है। इस विधि में अहंकार से अपने सच्चे स्वरुप के जुदापन की वजह से यह आनंदमय अवस्था उत्पन्न होती है |

क्योंकि जब आप जान जाते हैं कि आप कौन हैं तब नकारात्मक परिस्थितियों को देखने का आपका नज़रिया ही बदल जाता है। इससे आपको जागृति रहती है कि यह जो अपमान, आक्षेप इत्यादि हो रहा है, वह मेरा नहीं है, परन्तु अहंकार का है|

इससे आगे डिप्रेशन के लिए परमानेंट उपाय क्या हो सकता है?

परम पूज्य दादा भगवान ने डिप्रेशन से निकलने के लिए चाबियाँ दी हैं।

Depression
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  • अगर कोई ऐसा कहे कि, “मैं निराश हूँ”, तो उससे निराशा का बोझ दस गुना और बढ़ जाता है। और अगर वह ऐसा कहे कि, “मैं निराश नहीं हूँ”, तो वही बोझ दस गुना कम हो जाता है।
    • आपको ‘उत्तेजितता’ या ‘निराशा’ को खुदपर हावी नहीं होने देना चाहिए। कुछ नहीं बिगड़ेगा| कुछ बुरा नहीं होगा।
  • जब डिप्रेशन आए और अगर आप तुरंत ही ऐसा कहें कि ‘मेरा नहीं’, तब आप आत्मा का अनुभव कर पाएँगे। सिर्फ बाहर से डिप्रेशन और भीतर से आनंदमयी अवस्था रहती है। जैसे ही आप ऐसा कहेंगे कि ‘यह मेरा स्वभाव नहीं है’, तो आप तुरंत ही आत्मा में स्थिर हो जाएँगे| अच्छा या बुरा प्रत्येक संयोग, परसत्ता का ही हिस्सा है। उनमें से कुछ भी आत्मा का भाग नहीं है| सारी परिस्थितियाँ भी परसत्ता ही कहलाती हैं| आज जो भी परिस्थिति हमारे सामने आती है, वह हमारे पिछले जन्म की गलतियों का ही परिणाम है। ‘मेरा नहीं’ इन शब्दों से वैज्ञानिक असर होता है| चाहे कोई ज्ञाता-दृष्टा की अवस्था में रह पाए या नहीं लेकिन ‘मेरा नहीं’ ऐसा कहेगा तो तुरंत ही जुदापन आ जाएगा!
  • जब डिप्रेशन महसूस हो, तब उसके साथ एकाकार नहीं होना है, उससे अलग रहना है। किसी भी परिस्थिति में जब डिप्रेशन आए, तब अगर उसने यह ज्ञान लिया हो तो वह आत्मा का अनुभव कर सकेगा| डिप्रेशन के समय में भी आपको जो आनंद रहता है, वही आपका स्थान है। यह ‘ज्ञान’ आपको वह स्थान प्राप्त करने में मदद करता है। जब भी सांसारिक जीवन में समस्याएँ आती हैं तब भी भीतर जो आनंद रहता है, वह आपका स्थान है। इस तरह से आप अपने सही स्थान को पहचान सकते हैं, कि ‘यह मेरा स्थान है और यह स्थान मेरा नहीं है!’ अन्यथा चाहे कैसा भी कर्म आ जाए, उसमें अगर आप ऐसा कहें कि, ‘यह मेरा नहीं है’ तो वह आपको छोड़ देता है, क्योंकि यह आपका है और यह किसी और का है। इसे इस तरह से अलग किया गया है|

प्रश्नकर्ता : निराशा के समय में भी उसे जागृति रहती है और वह यह भी जानता है कि यह मुझे नहीं हो रहा है।

दादाश्री : वास्तव में वही आत्मा है| लेकिन इसके बजाय वह एक निराशा के प्रभाव में धूमिल और ठंडा हो जाता है। जब उसे ऐसा होता है तब आपको उसे उत्साहित करने की ज़रूरत है। इसके अलावा और कर भी क्या सकते हैं ? यह ज़रूरी नहीं है कि आप उसे हर दिन उत्साहित कर पाएं। सिर्फ जब डिप्रेशन आए, तब यह कहना आवश्यक है, “मैं अनंत शक्तिवाला हूँ”, मैं अनंत सुख का धाम हूँ।”

वह जगह जहाँ पर कभी भी निराशा नहीं आ सकती, वह ‘हमारी’ जगह है। वह जगह, अनंत सुख का धाम है। अगर आप ऐसा कहोगे तो आप अपने स्थान की तरफ आसानी से आगे बढ़ पाओगे।

  • जब डिप्रेशन हो और तब यदि आप इस जागृति में रहें कि, ‘यह मेरा वास्तविक स्वरूप नहीं है’, ‘मैं शुद्धात्मा हूँ’, मैं इस डिप्रेशन को जानता हूँ’| यदि ऐसा जुदापन रहे तो आपका उद्देश्य पूरा हो जाता है। लगातार जागृति की रक्षा करना, उसे पुष्टि देते रहना और पोषण देना वही वास्तव में खुद का शुद्धात्मा स्वरुप है।

प्रश्नकर्ता : और वास्तव में आत्मा ज्ञाता ही है, है न? कब डिप्रेशन हुआ, कितना हुआ, क्या वह पिछली बार से कम है या ज्यादा है?

दादाश्री : आत्मा सबकुछ जानता है।

प्रश्नकर्ता : जैसे कोई निराशा में भी ज्ञाता रहता है, उसी तरह उन्नति में भी आत्मा में रहे, तो फिर निराशा का समय ही नहीं आएगा, है न?

दादाश्री : अगर कोई अपने बारे में अच्छा सुनता है और तब, ‘आत्मा जानता है कि उस समय आप मान में जकड़ गए हैं। एक बार ऊंचाई पर चढ़े हैं तो निश्चित ही नीचे आना होगा।’

“इस दुनिया में कोई जगह या परिस्थिति ऐसी नहीं है कि जो आपको दबाकर रख सके। अभी, यहाँ, आप सबकुछ समर्पित करते हैं तो अहंकार चला जाता है। ज्ञान के बाद निराशा (डिप्रेशन) या ख़ुशी (एलिवेशन) नहीं रहती है। यहाँ तक कि आपको किसी ने डांटा या जेल में डाला,तो भी आप निराश नहीं होते हैं, और इसे ‘विज्ञान’ कहते हैं, यह एक आध्यात्मिक विज्ञान है।”

~परम पूज्य दादाश्री

पढ़िए, अनेक लोंगो की सफलता की कहानियाँ जो आत्मज्ञान प्राप्ति के बाद निराशा से बाहर निकल सके और जीवन जीने की दृष्टि प्राप्त की|

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