‘कर्म’ शब्द का उपयोग अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरीके से किया जाता है। अगर आप यह पेज पढ़ रहे हैं, तो यह संभव है कि आप उन हजारों लोगों में से एक होंगे जो इस शब्द, ‘कर्म’ का मर्म जानने के प्रयत्न में हैं।

इसे पढ़कर आप यह जान सकते हैं कि हमारे जीवन में किस तरह से हमारे इरादे, हमारी इच्छाएँ और हमारी भावनाएँ, हमारे आचरण को और हमारी क्रियाओं को प्रभावित करते हैं और कैसे इन सब का सम्बन्ध “कर्म” से है।

संस्कृत भाषा में ‘कर्म’ का अर्थ है ‘कार्य’ या ‘क्रिया’। वे सारी क्रियाएँ जो न सिर्फ हम शरीर द्वारा करते हैं लेकिन अपने मन और वाणी द्वारा भी करते हैं, उसे कर्म कहते हैं।

  • कर्म को भूतकाल का एक प्रतिस्पंदन और भविष्यकाल का कारण भी कहा जाता है।
  • रोज़मर्रा की सामान्य क्रियाएँ जैसे - काम पर जाना, अच्छे काम करना, दया भाव आदि, सामान्य तौर पर इन सब को भी कर्म ही कहा जाता है।
  • आत्मज्ञानी परम पूज्य दादाश्रीअपने ज्ञान द्वारा कहते हैं कि हमारी आज की सभी क्रियाएँ पिछले जन्म के कर्मों के फलस्वरूप हैं। इसलिए हमारे जीवन में अभी आपको जो कुछ भी दिखाई देता है, वह सब हमारे पहले के अभिप्राय का फल है।

कर्म बंधन क्या हैं?

कर्म क्या है? कर्म बंधन कैसे होता है? कर्म बंधन करता भाव से होता हैं| अधिक कर्म का विज्ञान जानने के लिए देखिये यह विडियो|

आश्चर्य हुआ न, तो चलो इसे जान लें...

  • हमारे ‘कर्मों’ के कारण ही हम लगातार जन्मोंजन्म के चक्कर में आते हैं।
  • हमारे सभी सुख और दुःख के अनुभव हमारे पूर्व जन्मों में चार्ज या इकट्ठे किए गए कर्मों का परिणाम हैं।
  • कभी भी एक नकारात्मक क्रिया अन्य सकारात्मक क्रिया द्वारा मिटाई नहीं जा सकती| हमें इन दोनों के अलग-अलग परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
  • आत्मानुभव प्राप्त करने के बाद भी आप अभी की तरह ही अपना सारा व्यवहार करते हुए आनंद से रह सकते हैं| ज्ञान प्राप्त करने के बाद किसी भी प्रकार का कर्म बंधन नहीं होता और आगे चलकर केवलज्ञान की प्राप्ति होती है।
  • सब कर्मों के समाप्त हो जाने पर अंतिम मोक्ष की प्राप्ति होती है।

परम पूज्य दादाश्री ने बेहद सरल भाषा में हमें कर्म के विज्ञान को समझने की सभी चाबियाँ दी हैं।

karma
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  • कर्म का फल कोई सज़ा या इनाम नहीं है, लेकिन सामान्य तौर पर वह हमारे भीतर के ही अभिप्रायों का फल है।
  • जो कर्मबीज पिछले जन्म में बोये थे, उन कर्मों के फल इस जन्म में आते हैं। तो यह फल कौन देता होगा? भगवान? नहीं, जब उपयुक्त परिस्थितियाँ परिपक्व होती हैं तब प्राकृतिक रूप से हमें कर्मफल का अनुभव होता है। इसे दादाश्री ‘सायंटिफिक सरकमस्टेंशियल एविडेंस’ (व्यवस्थित शक्ति) कहते हैं।
  • किसी भी प्रकार की क्रिया या कर्मफल को भोगते समय हमारे भाव और खुद के स्वरूप की अज्ञानता ही हमारे नए कर्म चार्ज होने का मूल कारण है।

यदि आपको कोई प्रश्न हो या आप अपनी किसी भी समस्या का समाधान चाहते हैं, तो आप हमें [ई-मेल] भेजिए और हम शीघ्र ही उसका जवाब देंगे।

हम अपने खुद के ही कर्म की प्रतिकृति हैं।

हर वह चीज़ जिसका हम अनुभव करते हैं, हमारी ही रचना है और इसके लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं है। हमारे अनंत जन्मों के लिए हम खुद ही पूर्ण रूप से ज़िम्मेदार हैं।

बहुत से लोगों का मानना है कि जीवन में वे जो कुछ भी अनुभव करते हैं, वह सब उनका ही किया हुआ है। इसलिए वे उसे बदलने की कोशिश करते हैं, लेकिन उसमें असफल होते हैं, क्योंकि उसे बदलना उनके हाथ में नहीं हैं। फल को बदलने के बारे में सोचना सही है, लेकिन क्या इसके लिए वे स्वतंत्र रूप से सक्षम हैं?

हाँ हैं, लेकिन कुछ हद तक। उसका अधिकतर नियंत्रण उनके हाथ में नहीं है। सिर्फ आत्मज्ञान प्राप्ति के बाद ही ऐसा संभव हैं, तब तक यह संभव नहीं है।

अगर ऐसा हैं तो...

  • क्या मैं इस ज्ञान का उपयोग अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कर सकता हूँ?
  • मेरे कर्मों की कोई नकारात्मक असर होने से पहले ही क्या मैं उनसे मुक्त हो सकता हूँ?
  • क्या ऐसा हो सकता है कि मैं सामान्य रूप से अपना जीवन जीते हुए भी कर्म न बांधूं और अपनी आत्मानन्द की अवस्था का अनुभव कर सकूँ?
  • क्या मैं अपने अनंत जन्मों के कर्मबंधनों से मुक्त हो सकता हूँ?

कर्म के बारे में और अच्छी तरह से समझने के लिए पाएँ एक मुफ्त किताब।

ऊपर लिखे हुए प्रश्नों के जवाबोंके लिए एवं अधिक जानकारी के लिए पढ़ें पुस्तक, “कर्म का विज्ञान”। इस किताब में सभी कर्मबंधनों से मुक्त होने के लिए बहुत ही रोचक तथ्यों का खुलासा किया गया है। इसे पढ़ने से आपके जीवन में होनेवाली घटनाओं के पीछे छिपे हुए रहस्य धीरे-धीरे खुलते जाएँगे।

आप इसमें विभिन्न प्रकार के कर्मों के बारे में ज़्यादा गहराई से जान पायेंगे और साथ ही आपको मिलेगा अपने पिछले कर्मों से मुक्त होने का रास्ता जैसे कि किस तरह से अपनी नकारत्मकता से निकलकर जीवन में आंतरिक शांति का अनुभव करें|

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आइये इस शाश्वत आनंद को प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक यात्रा की शुरूआत करें।

कर्म के सिद्धांत को समझने से कर्म के विज्ञान और उसकी क्रियाविधि को समझने में मदद होगी। लेकिन शायद फिर भी आपको यह प्रश्न होगा:

मोक्ष तक पहुँचने की यात्रा कैसे शुरू करें?

अपने शाश्वत सुख को पाने की यात्रा का पहला ज़रूरी कदम है - खुद को जानना| ‘ज्ञानविधि’ अर्थात आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया द्वारा यह सिर्फ दो ही घंटों में प्राप्त किया जा सकता है।

दादाश्री के शब्दों में:

“अगर एक बार आप अपने आत्म स्वभाव में आ जाओ तो नया कर्मबंधन नहीं होगा। यह तब होता है जब ज्ञानीपुरुष आपको अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान करवा देते हैं। उसके बाद, नए कर्म नहीं बंधते और पुराने कर्म लगातार खाली होते जाते हैं। जब सभी कर्म पूरे हो जाते हैं तब मोक्ष प्राप्ति होती है।”

भिन्न भिन्न पृष्ठभूमि के लोग, चाहे वे दिन-प्रतिदिन की समस्याओं के समाधान ढूंढ रहे थे या फिर शाश्वत आनंद की खोज में थे, उन सभी को ज्ञानविधि द्वारा अपने जीवन की खोज का संतोषजनक हल प्राप्त हुआ है।

इस बात का विश्वास करने के लिए इसे अनुभव करना ज़रूरी है!

जिन लोगों ने “ज्ञानविधि” द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त किया है, उन लोगों के अनुभवों को देखने के लिए, क्लिक करे :

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